माइक पोम्पेयो ने जर्मनी की यात्रा रद्द करके अचानक बग़दाद की यात्रा की और वहां राष्ट्रपति बरहम सालेह और प्रधानमंत्री आदिल अब्दुल मेहदी से मुलाक़ात करके यह समझने की कोशिश की कि यदि इराक़ में मौजूद साढ़े पांच हज़ार अमरीकी सैनिकों पर हमला हो गया तो इराक़ से अमरीका तथा अमरीका के घटकों के संबंध तनावूर्ण हो जाएंगे।
रोचक बात तो यह है कि अमरीका ने अपने सैनिक इराक़ी सेना की मदद के लिए भेजे थे और बाद में एक तमाशा यह भी हुआ कि इन अमरीकी सैनिकों की मदद के लिए ब्रिटिश सैनिक भेजे गए जिस पर इराक़ में भारी विरोध भी सामने आया।
वैसे इराक़ के राजनैतिक दलों ने संसद में मांग करके दो प्रस्ताव पारित करवाए जिनमें स्पष्ट रूप से कहा गया कि अमरीकी सैनिकों की हमें कोई ज़रूरत नहीं है इन्हें इराक़ से बाहर निकाल दिया जाना चाहिए।
माइक पोम्पेयो का कहना है कि इराक़ में उन्हें आश्वासन मिला है कि इराक़ी सरकार को अपनी ज़िम्मेदारी का पूरी तरह आभास है और सरकार अपनी ज़िम्मेदारी पर अमल करेगी। हम नहीं चाहते कि इराक़ के आंतरिक मामलों में कोई देश हस्तक्षेप करे।
अमरीकी विदेश मंत्री के बयान से अमरीकी सरकार के आत्म विश्वास की कमी साफ़ झलक रही है। अमरीकी सरकार को पूरी तरह यक़ीन हो चुका है कि यदि इस्लामी गणतंत्र ईरान ने जवाबी कार्यवाही करने का फ़ैसला कर लिया तो वह एसा करने में सक्षम है। यही नहीं अमरीकी तो यहां तक कह रहे हैं कि पश्चिमी एशिया के इलाक़े में ईरान के हाथ काफ़ी लंबे हैं और वह अमरीकी सैनिकों पर अपने सहयोगी संगठनों से हमला कर सकता है। इसीलिए अमरीकी अधिकारियों ने कहा था कि यदि किसी संगठन ने अमरीकी सैनिकों पर हमला किया तो इस हमले के लिए प्रत्यक्ष रूप से ईरान को ज़िम्मेदार माना जाएगा।
इन परिस्थितियों को सामने रखकर पश्चिमी एशिया के इलाक़े में अमरीका के भविष्य को समझना भी आसान है। पश्चिमी एशिया में अमरीका ने अपने कई घटक तैयार किए लेकिन इन घटकों की समस्या यह है कि वहां तानाशाही सरकारें हैं और यह सरकारें जनता में फैलने वाली जागरूकता के कारण ख़ुद को ख़तरे में महसूस कर रही हैं। नतीजा यह है कि दशकों से चले आ रहे समीकरण तेज़ी से बदल रहे हैं और हालत यह हो गई है कि अमरीकी सरकार इस पूरे इलाक़े में अलग अलग जगहों पर तैनात अपने सैनिकों की सुरक्षा की चिंता है। अमरीका को यह यक़ीन है कि इलाक़े में एसी ताक़तें मौजूद हैं जो अमरीकी सैनिकों को निशाना बना सकती हैं।
जहां तक यह सवाल है कि अमरीकी सैनिकों पर ईरान की ओर से या ईरान के सहयोगी संगठनों की ओर से हमला हो सकता है या नहीं तो इसका जवाब यह है कि अमरीकी सैनिकों पर हमला करने की ईरान को ज़रूरत नहीं है। क्योंकि यह बात तो ख़ुद अमरीकी विचारक भी मानते हैं कि पश्चिमी एशिया का इलाक़ा अमरीका के हाथ से निकलता जा रहा है। हालात का रुख़ यह बताता है कि ऊर्जा के प्रमुख केन्द्र के रूप में ख्याति रखने वाले इस इलाक़े में अमरीका का प्रभाव पूरी तरह समाप्त हो जाएगा क्योंकि उन सरकारों का अस्तित्व ख़तरे में है जो अमरीकी हितों की रक्षा करती थीं और इसके बदले में अमरीका इन तानाशाही सरकारों के अस्तित्व की रक्षा करता था। जब हालात यह हैं तो ईरान को अमरीकी सैनिकों पर हमला करने की कोई ज़रूरत नहीं है अलबत्ता यह तो निश्चित है कि यदि अमरीका ने ईरान के हितों को निशाना बनाने की कोशिश की तो जवाबी कार्यवाही ज़रूर हो सकती है। अमरीका अपने सैनिकों की सुरक्षा के लिए इराक़ से मदद मांग रहा है और उसे राष्ट्रीय हितों की याद दिला रहा है शायद अमरीका यह भूल गया है कि इराक़ ईरान के अत्यंत क़रीबी घटकों में से एक है।